Thursday, 19 January 2017

सलीका नहीं आता।

तुम्हे जिंदगी जीने का सलीका नहीं आता
रो रो कर उनको भूलने का तरीका नहीं आता।।

मुख़्तलिफ़ थी दुनियां की रवायतें कुछ
ख्वाबीदा थी एक तस्वीर उसमे नूर नहीं आता।।

वो मुन्तज़िर थे झलक को तेरी इक
अब इस तड़प का कोई अंजाम नही आता।।

सवाल -ऐ-वस्ल पर यूँहीं मुकर गए वो
मेरे रक़ीब तुझे कुछ छिपाना नहीं आता।।

मुसलसल चल रहे हैँ अंजान सी दौड़ में
मंजिलो का कोई ठिकाना नजर नहीं आता।।

Thursday, 12 January 2017

हलचल

सुनती रहती हूँ उन हलचलों को अक्सर
कुछ अनकही चीज़ें है 
कुछ उलझे से एहसास हैँ
इक अधूरी सी तमन्ना है

दूर कहीं इक आवाज पुकारती है
पर्वतों क़े सन्नाटे बुलाते हैं
सुन के भी अनसुना कर सकूँ
ये कैसें कर दूँ मै

आहटों के पीछे की कमज़ोरी
तुमसे बहुत कुछ न कह पाने की मजबूरी
विकल हो  रही हैं  ये सर्दियाँ
परवाज़ इन्हें शायद तुम्हारी है।