Sunday, 25 September 2016

क्योंकि मै उम्मीद नही रखती



मै तो लेकर चलना चाहती थी तुमको साथ
लेकिन तुम तो पड़े हो उन्ही रवायतों में
अनसुने विचार प्रकट हो गए थे
लेकिन तुम्हारी हकीकत अभी भी नहीं
अब मै इस समाज से कोई भी चाहत नही करती
क्योंकि वो क्या है न मैं उम्मीद नहीं रखती।

गलत नहीं हो तुम शायद...लेकिन गलत मैं भी तो नहीं
जिंदगी में बस एक तुम्हारी ही कमी तो नहीं
मै सोच के हैरान हूँ कि तुम साधारण ही निकले
सोच थी दुनिया बदलने की और तुम पीछे ही निकले
इसलिए शायद अब मै कोई उम्मीद नहीं रखती

शायद इस बंधन को तुम बंधन समझो....
और क्या बंधन ही है ये...तुम्हारी सोच का बंधन
क्यों मुक्त नही....क्यों उन्ही झंझटों में हो
मै तो दो पल ठहर कर तुम्हे सहारा दे भी दूँ
लेकिन वो क्या है न मैं उम्मीद नहीं रखती

मौसम से नज़ारे एक तरफ तुमसे किनारे एकतरफ
तुम जो तुम हो....शायद वो तुम हो ही नही
परदे के पीछे कुछ और ही था...
और जो मैं देखती रही वो था एक छदम्
मैं तो अब सम्भाल लूँ अपने को
लेकिन तुम्हारा सोच के अब परेशान नहीं होती
क्योंकि मैं अब कोई उम्मीद नहीं रखती...