Sunday, 5 June 2016

मैं तुम और मेरा लखनऊ

तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है....अंधेरो को भी मिल गयी रौशनी है"...
तुम्हे याद है ये मेरा पसंदीदा गाना हुआ करता था.....आज भी तुम्हारा नाम जब सुनती हूँ...पता नही क्या टूट जाता है अंदर.... टूटे हुए टुकड़ो को समेटना चाहती हूँ....कि जिंदगी फिर से पटरी पर आ जाये..... ये टूटन अंदर भी है और बाहर भी.... लाल पुल पर से जब भी गुज़रती हूँ तो तुम्हारी बात याद आ जाती है...एक दिन इस तरह का लाल रंग तुम्हारे माथे पर होगा.... पर तुम्हे पता है...लाल पुल धीरे धीरे ढल रहा है...मतलब उसका लाल रंग क्षीण हो रहा है..... तुम्हारे हाथों में हाथ डाले.... रूमी गेट से इमामबाड़ा.... वहाँ से क्रिस्टियन कॉलेज...वहाँ से हज़रत गंज....सब टहलते रहते थे....अब सोचते हैं कि जिंदगी वहीँ थमी रहती तो कितना बेहतर होता..... सुनो वो बेंच याद है न.... जिसपर घण्टों बैठे रहते थे.... पता है अब वहाँ उस तरह की और बेंचेस् लग गयीं हैं..... पर मैं रोज गुज़रते हुए तुम्हे ही खोजती रहती हूँ....क्या पता एक नज़र तुम मिल ही जाओ..... तुम ..क्या तुम भी मुझे याद करते हो....? मेरे बालों में उंगलियां घुमाते हुए आँखों में आँखे डालते थे तो तुम्हारी आँखों में ये जो सौम्यता थी न बस यही मुझे अपार शांति और ख़ुशी देती थी.... तुमको पहले ये हमारा लखनऊ नहीं पसंद था...कहते थे क्या है ऐसा इस शहर में...
 लेकिन बाद में तुमको लखनऊ से मोहब्बत पहले...हमसे बाद में हुई.... हम तुमको कहते थे न ...हमारा शहर तुमको अपना बना ही लेगा.....  ये जो रूमी दरवाजे से जो शाम की धूप सीधे तुम्हारे चेहरे पर पड़ती थी न.... बस यही हाँ बस यही मेरे लखनऊ की शामे थी...शाम-ए-अवध के सबके अपने किस्से हैं....मेरा ये हैं...मेरा तो हर किस्सा तुम पर शुरू तुम पर ही खत्म हो जाता है.... तुमसे ये लगाव इतना अपार प्रेम कब हो गया इन चौक की गलियों में घूमते घूमते कुछ पता ही न चला....... ये मेरा अंजुमन था मेरा लखनऊ...जहाँ हमारी दुनियां ने एक खूबसूरत मोड़ लिया था....तुम मुझे मेरी दुनिया से दूर USA ले जाना चाहते थे..... तुम मुझे स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी दिखाना चाहते थे..... और अमरीका की सैर कराना चाहते थे...मैं तैयार भी थी लेकिन वहीँ हमेशा बस जाने की शर्त पर नही.... हमारे लिए तो लखनऊ विश्वविद्यालय किसी भी ऐतिहासिक इमारत से जादा प्रिय है....ऐसा नही है कि मै लखनऊ नही छोड़ती तुम्हारे लिए....तुम्हारे लिए तो मै दुनिया कि हर चीज से बगावत क्र देती....सब से लड़ जाती....बस लेकिन तुमसे ही न लड़ पायी तुम्हारे लिए.... खैर आज तुम्हारी शादी की पहली सालगिरह मुबारक हो....सुना है....दिल्ली आये हो...छप्पन भोग का पार्सल भेज रही हूँ...स्वीकार कर लेना.....

तुम्हारी लखनऊ वाली एक दोस्त....

1 comment:

  1. Shaandar likha hai aapne juhu ji...bht mja aaya pdh ke...

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